अमर-शहीद Rajendra nath Lahiri: 97वां बलिदान दिवस 17 दिसंबर 1927

अमर-शहीद Rajendra nath Lahiri: 97वां बलिदान दिवस 17 दिसंबर 1927

अमर-शहीद Rajendra nath Lahiri (राजेंद्र नाथ लाहिड़ी) का 97वां बलिदान दिवस 17 दिसम्बर 1927

भारत की आज़ादी की जंग अनगिनत बलिदानों से भरी हुई है, जिनमें अमर-शहीद Rajendra nath Lahiri (राजेंद्र नाथ लाहिड़ी) का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का वरण किया।
2024–2025 में उनका 97वां बलिदान दिवस पूरे सम्मान और गर्व के साथ मनाया गया।

अमर-शहीद Rajendra nath Lahiri: 97वां बलिदान दिवस 17 दिसंबर 1927

Rajendra nath लाहिड़ी का प्रारंभिक जीवन

Rajendra nath लाहिड़ी जी का जन्म 29 जून 1901 को फारुकााबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
पढ़ाई के दौरान ही उनमें देशभक्ति की ज्वाला जाग उठी।
किशोर अवस्था से ही अन्याय के प्रति विद्रोह और ब्रिटिश शासन की अत्याचारपूर्ण नीतियों के खिलाफ उनकी सोच दृढ़ हो गई।

क्रांतिकारी आंदोलन में प्रवेश

वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े, जिसका उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष द्वारा भारत को स्वतंत्र कराना था।
उनकी विचारधारा स्पष्ट थी —
“आजादी भीख में नहीं, संघर्ष से मिलती है।”

काकोरी कांड – आज़ादी का बेजोड़ पन्ना

9 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन डकैती एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी घटना थी।
इस घटना की योजना में लाहिड़ी जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

काकोरी कांड में शामिल क्रांतिकारी:

  • राम प्रसाद बिस्मिल
  • अशफाकउल्ला खां
  • ठाकुर रोशन सिंह
  • राजेंद्र नाथ लाहिड़ी

ब्रिटिश शासन ने इस घटना को अपने साम्राज्य के लिए खतरे के रूप में देखा और क्रांतिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की।

लाहिड़ी जी की मुख्य भूमिका

उन्होंने इस पूरी योजना को सफल बनाने में बौद्धिक और रणनीतिक दोनों रूप से सहयोग दिया।
काकोरी घटना के क्रियान्वयन के समय वे सक्रिय रूप से नेतृत्व कर रहे थे।

गिरफ्तारी, मुकदमा और सजा

घटना के कुछ समय बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
मुकदमे में ब्रिटिश न्यायालय ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई।

कोर्ट में भी उनका आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम झलकता रहा।
उन्होंने कहा—
“भारत की आज़ादी मेरा अंतिम उद्देश्य है, चाहे इसके लिए जीवन ही क्यों न देना पड़े।”

17 दिसंबर 1927 – अमर बलिदान का दिन

गोंडा जेल में 17 दिसंबर 1927 की सुबह, जेल प्रशासन ने उन्हें निर्धारित तारीख से पहले ही फांसी दे दी।
ब्रिटिश सरकार को डर था कि अगर उन्हें अन्य साथियों के साथ फांसी दी गई तो जनता का रोष बढ़ जाएगा।

उनकी शहादत की खबर से पूरे देश में शोक और आक्रोश की लहर फैल गई।

शहीद लाहिड़ी का व्यक्तित्व और विचार

वे अत्यंत सरल, अनुशासित और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे।
उनका जीवन संदेश देता है—
“देश सबसे पहले है, बाकी सब बाद में।”

स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

लाहिड़ी जी के नेतृत्व और विचारों ने काकोरी आंदोलन को एक नई दिशा दी।
उनका साहस और बलिदान आज भी युवाओं को देशप्रेम के लिए प्रेरित करता है।

97वें बलिदान दिवस का आयोजन (2024–2025)

देशभर में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की गईं।
विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों ने उनकी स्मृति में कार्यक्रम किए।
उनके विचारों को दोहराया गया और उनके सपनों के भारत पर चर्चा हुई।

आज की पीढ़ी के लिए संदेश

आज की युवा पीढ़ी के लिए लाहिड़ी जी का जीवन एक प्रेरक धरोहर है।
वे सिखाते हैं कि कठिनाइयों से डरकर नहीं, बल्कि दृढ़ साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

लाहिड़ी जी से जुड़ी कम ज्ञात बातें

  • वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और गीता का गहरा अध्ययन करते थे।
  • फांसी से पहले लिखा हुआ उनका आखिरी पत्र आज भी देशभक्ति का स्रोत है।
  • जेल में भी अनुशासन और शांति का पालन करते थे।

साहित्य और इतिहास में स्थान

उनकी वीरता पर अनेक पुस्तकें, कविताएं और शोध लिखे जा चुके हैं।
इतिहासकारों ने उन्हें काकोरी कांड का “मौन नायक” कहा है।

निष्कर्ष

अमर-शहीद राजेंद्र नाथ लाहिड़ी का बलिदान भारत की स्वतंत्रता का आधार स्तंभ है।
उनका 97वां बलिदान दिवस हमें यह याद दिलाता है कि आज़ादी की कीमत अनमोल है और इसे बनाए रखना हमारा कर्तव्य।


FAQs

1. राजेंद्र नाथ लाहिड़ी कौन थे?

वे काकोरी कांड के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे।

2. लाहिड़ी जी को फांसी कब दी गई?

17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में।

3. काकोरी कांड क्या था?

यह ब्रिटिश राज के खजाने को निशाना बनाकर किया गया क्रांतिकारी ट्रेन डकैती अभियान था।

4. उनका प्रमुख उद्देश्य क्या था?

भारत को ब्रिटिश शासन से पूरी तरह मुक्त कराना।

5. 97वां बलिदान दिवस कैसे मनाया गया?

श्रद्धांजलि सभाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, व संगोष्ठियों के माध्यम से देशभर में उनकी स्मृति का सम्मान किया गया।

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